Do you remember the title?

Friday, August 7, 2020

सर्द रात

सर्द रात है मेरे साथी,
सूरज आज देर से निकलेगा।

तू आसमां को यूं न ताक,
तू क्षितिज पे यूं न झांक।
उम्मीद को कलाई में बांधकर,
सितारों को इस तरह न हांक।

सर्द रात है मेरे साथी,
सूरज निकलेगा भी तो कम चमकेगा।

फूल खिलेंगे भी तो मुरझा जाएंगे,
पत्ते निकलेंगे भी तो झड़ जाएंगे।
कोहरे की चादर ओढ़कर,
रोशनी आएगी और चली जाएगी।

सर्द रात है मेरे साथी,
सूरज आज जल्दी डूब जाएगा।

Wednesday, July 29, 2020

अम्बर बरसे

Guest Post by my friend Saurav Pati:


अम्बर बरसे नैन कहीं। 
ग़ालिब तरसे चैन कहीं।।

ग़ज़ल लिखें हजारों कईं।
ज़ालिम मुहब्बत मुकम्मल नहीं।।

क्षण गुज़रे ख़ूब नऐं कईं।
यादों सा जन्नत उनमें नहीं।।

रास्ते मिले केनो साईं।
हमराह तेओ सा केओ नाईं॥


Monday, December 19, 2016

इंतज़ार

waiting
मैं ख़्वाबों की दुनिया से भटकता ख़्यालों की दुनिया तक आया,
पर ज़िन्दगी की जुस्तजू पर न कह पाया, न सह पाया।

कुछ क़द बढ़ा तो क़दम बढ़े,
ख़ुशी न बढ़ी पर ग़म बढ़े,
कुछ दूर चला तो पता चला
कि गिरती सीढ़ियों पर कैसे हम चढ़े।

कुछ आस थी, कुछ प्यास थी,
कुछ आह थी कुछ चाह थी,
कि यूँ तो मंज़िलों से भरा था मंज़र,
पर जिस पर हम चले वो राह थी।

सह गया सब काँटों को,
और ज़ंजीरों को मैं तोड़ आया,
पर कुछ दूर चला तो पता चला,
कि ख़ुद को मैं कहीं पीछे छोड़ आया।

जीत के जश्न में इस हार का इज़हार कर रहा हूँ,
मैं न जाने कब से अपना इंतज़ार कर रहा हूँ।

Friday, November 11, 2016

कह दूँ या सह लूँ

Silence

कुछ अल्फ़ाज़ों ने लिख दिए,
कुछ लफ़्ज़ कह गए।
पर शब्द जो दिल में थे,
सो दफ़्न ही रह गए।

सोचता हूँ कि क्यूँ आख़िर,
हर आह आवाज़ ढूँढती है।
चीख़ते तो तुम हो,
पर न जाने क्यों इस वादी में,
ख़ामोशियाँ मेरी गूँजती है।

लब पे ऊँगलियाँ रख दूँ, तो
कई इसे मेरी कमज़ोरी,
कई मेरा मत समझ लेते हैं।
पर क्या करूँ-
न कहता हूँ तो कोई समझता ही नहीं,
कह देता हूँ तो लोग ग़लत समझ लेते हैं।

Sunday, August 28, 2016

ग़ुरूर

Self-Esteem

बस ख़ामोशी ही गूँज रही थी,
वो वादी ही कुछ ऐसी थी।
क्या कहता, क्या बयां करता,
वो बात ही कुछ ऐसी थी।

ये दिल है, कंधा नहीं,
अब और बोझ सह नहीं सकता।
कुछ और पल अब बिन कहे,
मैं रह नहीं सकता।

वो मीत मेरा था,
बेचारा मुश्किल में था रह रहा।
मैंने मदद के लिए हाथ बढ़ाया था,
पर वह समझ बैठा कि मैं हाथ उठा
उसे अलविदा कह रहा।
मुझे लगा कुछ तो ग़लत है,
इक 'ग़लत'फ़हमी ज़रूर है।
पर वो मुँह मोड़कर कहता है,
"देखो! इसे ग़ुरूर है।"

हाँ! हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
पर नहीं वो इस शाह-ए-शरीर पर,
जिसे इक दिन ख़ाक़ हो जाना है।
नहीं दौलत-ए-दाय पर,
जिसे फिर यहीं छोड़ जाना है।
नहीं नामो-शोहरत पर,
जो अभी अदना भी नहीं।
नहीं इक ख़्वाब-सी किस्मत पर,
जो कभी मिली ही नहीं।

हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
सच तो तुम कभी मानोगे नहीं,
मैं ही हार मानता हूँ।
हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
Creative Commons License
All poems in this blog are written by Asher Ejaz and are licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License