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Thursday, July 1, 2021

ऐ ख़ुदा

ऐ ख़ुदा
मेरी ज़िन्दगी को दुश्वार कर दे
मुझे ग़म दे इतना मेरा दिल बेज़ार कर दे
मेरी रातों से सितारों को छीन ले
मेरा चांद बादलों को गिरफ्तार कर दे

ऐ ख़ुदा
हस्ती की अदाकारी में मुझको 
कोई और किरदार कर दे
मेरी कहानी को दिलचस्प कर दे
मेरे सफ़्हों को तार-तार कर दे

नहीं मांगता मैं‌ 
खुशियों की भीख
अहसासों से पहले की सीख
नहीं मांगता मैं‌ 

तू मेरी ज़िन्दगी को जंग कर दे
मेरे हौसलों को दंग कर दे
मेरी उम्मीदों को ज़र्द-रंग कर दे
मैं उससे जीत कर दिखाऊंगा

Tuesday, June 29, 2021

कैदखाना और मैं

मेरे पिंजरे को डर है कि मेरी आज़ादी के बाद
सुलगती आग में उसकी बर्बादी के बाद
कुछ बुरा होगा

बुरा तो होगा
इस घर का टूट जाना
सारे सामानों का लूट जाना
बुरा तो होगा
रौशनी का फूट जाना
रिहा हो जाना, छूट जाना
बुरा तो होगा

पर अरमां मेरे कुछ और है
दिल में सिर्फ आज़ादी का शोर है

वो तो हवाओं ने हाथों को रोककर रखा है
परछाई ज़मीन से बांधकर रखती है
वर्ना ये इंतज़ार मुझे क़ुबूल नहीं है
मैंने ख्वाबों में ये दीवारें फांद रखी है

एक दिन यकीनन
ये सारी ख्वाहिशें निकल जाएंगी
सारी ज़ंजीरें पिघल जाएंगी
उड़ूंगा मैं फिर
आज़ाद
बेतार
सितारों से आगे
क्षितिज के पार

इसीलिए तो
इस कैदखाने की हर इक दीवार से
मैं ये हर इक रोज़ कहता हूं
कि तुम मैं नहीं हूं
वक़्त की तख्ती से जो मिट जाए
सिमट जाए
वो शय नहीं हूं

मैं सिफर हूं, एकांत भी हूं
एक शोर हूं जो शांत भी हूं
मैं हूं ज़ाहिद, मुहाजिर भी हूं
मंज़िल भी मैं मुसाफ़िर भी हूं

छुपाते नहीं छुपता


छुपाते नहीं छुपता है प्यार हो चुका है
ये गुरूर नहीं है इज़हार हो चुका है

मैंने भी सोचा है कुछ नहीं बोलूंगा
दिल-ए-बेकरार से ये क़रार हो चुका है

रस्ता भी नहीं देती, आगे भी नहीं बढ़ती
ऐ ज़िंदगी, बहुत इंतज़ार हो चुका है

सालों बाद लौटा है अब वो बात नहीं
दिल अब जिस्म का किरायदार हो चुका है

मर्ग आज़ादी है ज़िन्दगी कैदखाना
इस बात पर थोड़ा सा ऐतबार हो चुका है

और फिर जब मौत आई मुझे यों लगा
ज़ाहिद ऐसा तो कई बार हो चुका है

Monday, June 28, 2021

क्या होता है


इश्क़ में सर होना, बेखबर होना
जुनून में तर होना, दर-बदर होना
क्या होता है

मोहब्बत के बाग़ों में शजर होना
रिफ़ाक़त के रस्तों का पत्थर होना
गुमानों की गुमशुदगी की खबर होना
फिर भी उम्मीद का ज़िन्दगी-भर होना
क्या होता है

रात का दिन भर होना
शराबों का बेअसर होना
ख्वाबों से बेखबर होना
बेसबब सब बेसबर होना
क्या होता है

रूह का जिस्म से बेघर होना
रात के अंधेरों को लेकर होना
शाम के उजालों से सहर होना
आज़ाद होना, अज़िय्यत-बर होना
क्या होता है

इश्क़ में सर होना, बेखबर होना
जुनून में तर होना, दर-बदर होना
क्या होता है

Thursday, June 24, 2021

नया सफ़र

उसी अलमारी में जिसमें
मैंने अपने डर को
छुपाकर रखा था
आज अपने ख़्वाबों को
सजाकर रखा है

रास्तों की पुकार से
मंज़िल की हुंकार से
सफर के करार से
दिल-ए-बेकरार से
चल पड़ा हूं

एक उम्मीद की मैली चादर है
एक शीशे का रक़्स खिलौना है
एक नाम भर की आज़ादी है
एक सूर्ख कांटों का बिछौना है

फिर गिरना तो मेरा हक हुआ ना
संभलना तो नाहक हुआ ना

क्यूं डरूं कि दरिया आग की हो कि पानी की
क्यूं डरूं कि कश्ती नूह की हो कि फोकानी की

क्या सतह पे मेरा अक्स आज नहीं दिखता
क्या किनारों पे मेरा नाम लिखा नहीं दिखता
नहीं दिखता इक भंवर का सैलाब बन जाना
या जुनून मेरे कदमों में छिपा नहीं दिखता

Friday, June 18, 2021

कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़िर


कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़िर 
वो ख़्वाब भी लेकर आओ ना
जो कसक हो दिल में कैद कहीं
और मन को मेरे बहलाओ ना।

अंधेरों से की है दोस्ती
अब रौशनी से नहीं वास्ता,
तुम चांद सितारे ले जाकर
आसमान को समझाओ ना।

अफवाह उड़ी है कि दर्द को
इश्क़ कहने से दर्द नहीं होता,
तुम दर्द और इश्क़ में
फर्क क्या है बतलाओ ना।

आंखों के तालाबों में


आंखों के तालाबों में पहरे हो गए
मुखौटे सबके अबके चेहरे हो गए

इतनी रौशनी कि सब अंधे हो गए
इतना सन्नाटा कि सब बहरे हो गए

ऐसे तो बारिश मेरा घर जला देगी
तुम कह दोगे नज़ारे सुनहरे हो गए

मैंने कहा था छोड़ दो इसी हाल पर मुझे
तुमने मरहम लगाया घाव गहरे हो गए

Friday, August 7, 2020

सर्द रात

सर्द रात है मेरे साथी,
सूरज आज देर से निकलेगा।

तू आसमां को यूं न ताक,
तू क्षितिज पे यूं न झांक।
उम्मीद को कलाई में बांधकर,
सितारों को इस तरह न हांक।

सर्द रात है मेरे साथी,
सूरज निकलेगा भी तो कम चमकेगा।

फूल खिलेंगे भी तो मुरझा जाएंगे,
पत्ते निकलेंगे भी तो झड़ जाएंगे।
कोहरे की चादर ओढ़कर,
रोशनी आएगी और चली जाएगी।

सर्द रात है मेरे साथी,
सूरज आज जल्दी डूब जाएगा।

Monday, December 19, 2016

इंतज़ार

waiting
मैं ख़्वाबों की दुनिया से भटकता ख़्यालों की दुनिया तक आया,
पर ज़िन्दगी की जुस्तजू पर न कह पाया, न सह पाया।

कुछ क़द बढ़ा तो क़दम बढ़े,
ख़ुशी न बढ़ी पर ग़म बढ़े,
कुछ दूर चला तो पता चला
कि गिरती सीढ़ियों पर कैसे हम चढ़े।

कुछ आस थी, कुछ प्यास थी,
कुछ आह थी कुछ चाह थी,
कि यूँ तो मंज़िलों से भरा था मंज़र,
पर जिस पर हम चले वो राह थी।

सह गया सब काँटों को,
और ज़ंजीरों को मैं तोड़ आया,
पर कुछ दूर चला तो पता चला,
कि ख़ुद को मैं कहीं पीछे छोड़ आया।

जीत के जश्न में इस हार का इज़हार कर रहा हूँ,
मैं न जाने कब से अपना इंतज़ार कर रहा हूँ।

Friday, November 11, 2016

कह दूँ या सह लूँ

Silence

कुछ अल्फ़ाज़ों ने लिख दिए,
कुछ लफ़्ज़ कह गए।
पर शब्द जो दिल में थे,
सो दफ़्न ही रह गए।

सोचता हूँ कि क्यूँ आख़िर,
हर आह आवाज़ ढूँढती है।
चीख़ते तो तुम हो,
पर न जाने क्यों इस वादी में,
ख़ामोशियाँ मेरी गूँजती है।

लब पे ऊँगलियाँ रख दूँ, तो
कई इसे मेरी कमज़ोरी,
कई मेरा मत समझ लेते हैं।
पर क्या करूँ-
न कहता हूँ तो कोई समझता ही नहीं,
कह देता हूँ तो लोग ग़लत समझ लेते हैं।

Sunday, August 28, 2016

ग़ुरूर

Self-Esteem

बस ख़ामोशी ही गूँज रही थी,
वो वादी ही कुछ ऐसी थी।
क्या कहता, क्या बयां करता,
वो बात ही कुछ ऐसी थी।

ये दिल है, कंधा नहीं,
अब और बोझ सह नहीं सकता।
कुछ और पल अब बिन कहे,
मैं रह नहीं सकता।

वो मीत मेरा था,
बेचारा मुश्किल में था रह रहा।
मैंने मदद के लिए हाथ बढ़ाया था,
पर वह समझ बैठा कि मैं हाथ उठा
उसे अलविदा कह रहा।
मुझे लगा कुछ तो ग़लत है,
इक 'ग़लत'फ़हमी ज़रूर है।
पर वो मुँह मोड़कर कहता है,
"देखो! इसे ग़ुरूर है।"

हाँ! हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
पर नहीं वो इस शाह-ए-शरीर पर,
जिसे इक दिन ख़ाक़ हो जाना है।
नहीं दौलत-ए-दाय पर,
जिसे फिर यहीं छोड़ जाना है।
नहीं नामो-शोहरत पर,
जो अभी अदना भी नहीं।
नहीं इक ख़्वाब-सी किस्मत पर,
जो कभी मिली ही नहीं।

हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
सच तो तुम कभी मानोगे नहीं,
मैं ही हार मानता हूँ।
हाँ, मुझे ग़ुरूर है!
हाँ, मुझे ग़ुरूर है!

बारिश की बूँदें

Rain Drops

ग़ुर्बत की कड़कड़ाती धूप में,
ज्यों हीरे और मोती बरसे।
जैसे होड़ लगी हो नीचे आने की,
ऊपरी कालिमा के डर से।
जैसे किसी ने आसमाँ फ़तह कर,
ख़ुशी के आँसू बहाए हो।
या फिर ऊपर वाले ने ही
कुछ नज़राने बरसाए हो।

आगमन से पहले ही इतनी बुलंदी,
कि डर से छिप गया सूरज बादलों के पीछे।
ढोल बजे, आतिशबाज़ियाँ चलीं,
और सूर्य राज का तख़्तापलट हो गया नीचे।
उधर हल-वाहा की सभी मुश्किलें 'हल' हो गईं,
और माटी के गुलामों के लिए,
बाहर की राह सरल हो गई।

झुर्रियों से भरी ज़मीं की,
अचानक ही जवानी लौट आई।
साथ ही, पेड़-पौधों में भी
इक हरित-क्रांति ले आई।
न जाने ऐसा क्या साथ ले आई
वो बारिश की बूँदे,
कि हर कोई खड़ा है हाथ फैलाए, आँखें मूँदे।
कोई रहमत बरस रही हो
या बख़्शिश की बारिश हो,
ऐसा भी क्या उफान मचा है,
मानो सब पक्की साज़िश हो।

एक मौसम जो खराब था,
एक सनसनाता सन्नाटा जो छाया था।
एक बच्चे की किलकारी जो गूँजी थी,
एक रंगीन लकीर कोई आसमाँ में खींच आया था।
सातों आसमाँ इक-इक रंग ले गए,
मानो बाण चला इंद्र-
धनुष छोड़ चले गए।
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