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Thursday, June 24, 2021

नया सफ़र

उसी अलमारी में जिसमें
मैंने अपने डर को
छुपाकर रखा था
आज अपने ख़्वाबों को
सजाकर रखा है

रास्तों की पुकार से
मंज़िल की हुंकार से
सफर के करार से
दिल-ए-बेकरार से
चल पड़ा हूं

एक उम्मीद की मैली चादर है
एक शीशे का रक़्स खिलौना है
एक नाम भर की आज़ादी है
एक सूर्ख कांटों का बिछौना है

फिर गिरना तो मेरा हक हुआ ना
संभलना तो नाहक हुआ ना

क्यूं डरूं कि दरिया आग की हो कि पानी की
क्यूं डरूं कि कश्ती नूह की हो कि फोकानी की

क्या सतह पे मेरा अक्स आज नहीं दिखता
क्या किनारों पे मेरा नाम लिखा नहीं दिखता
नहीं दिखता इक भंवर का सैलाब बन जाना
या जुनून मेरे कदमों में छिपा नहीं दिखता
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All poems in this blog are written by Asher Ejaz and are licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License