मैंने अपने डर को
छुपाकर रखा था
आज अपने ख़्वाबों को
सजाकर रखा है
रास्तों की पुकार से
मंज़िल की हुंकार से
सफर के करार से
दिल-ए-बेकरार से
चल पड़ा हूं
एक उम्मीद की मैली चादर है
एक शीशे का रक़्स खिलौना है
एक नाम भर की आज़ादी है
एक सूर्ख कांटों का बिछौना है
फिर गिरना तो मेरा हक हुआ ना
संभलना तो नाहक हुआ ना
क्यूं डरूं कि दरिया आग की हो कि पानी की
क्यूं डरूं कि कश्ती नूह की हो कि फोकानी की
क्या सतह पे मेरा अक्स आज नहीं दिखता
क्या किनारों पे मेरा नाम लिखा नहीं दिखता
नहीं दिखता इक भंवर का सैलाब बन जाना
या जुनून मेरे कदमों में छिपा नहीं दिखता
Wunderbar
ReplyDeletePerfect!
ReplyDelete