छुपाते नहीं छुपता है प्यार हो चुका है
ये गुरूर नहीं है इज़हार हो चुका है
मैंने भी सोचा है कुछ नहीं बोलूंगा
दिल-ए-बेकरार से ये क़रार हो चुका है
रस्ता भी नहीं देती, आगे भी नहीं बढ़ती
ऐ ज़िंदगी, बहुत इंतज़ार हो चुका है
सालों बाद लौटा है अब वो बात नहीं
दिल अब जिस्म का किरायदार हो चुका है
मर्ग आज़ादी है ज़िन्दगी कैदखाना
इस बात पर थोड़ा सा ऐतबार हो चुका है
और फिर जब मौत आई मुझे यों लगा
ज़ाहिद ऐसा तो कई बार हो चुका है
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